Sunday, July 31, 2011

फिर से आई दिवाली....


देखते-देखते नवम्बर आ गया और साथ ही आ गया दीपों का त्योहार दीपावली... आपको याद है पिछली बार दीपावली के दिन ही हमारी लाडो हॉस्पिटल से घर आई थी... हाँ तब तिथि थी १४ नवम्बर और इस बार तिथि थी ४ नवम्बर... तब बेटी छुई-मुई सी, नाज़ुक सी, पूरी दुनिया से बेखबर किसी भी हलचल से अनजान... नन्ही पलकों के पीछे सपनों में खोई रहती थी... लेकिन आज वो समझदार... नटखट... चुलबुली.. और बड़ी ही प्यारी सी गुड़िया में बदल चुकी थी... नौ महीने में चलना शुरू कर देने वाली हमारी लाडली ने घुटनों की जगह सीधे पाँव से ही चलना शुरू कर दिया था और अब तो वो बिंदास दौड़ती-भागती घर के हर कोने को अपनी मीठी रुनझुन से आबाद किये रहती थी... और दीपावली के दिन तो बेटी बहुत-बहुत खुश थी... दीयों की रोशनी सी झिलमिलाती उसकी ख़ुशी... रंगबिरंगी रोशनियों सी चमकती उसकी आँखें... पूरे घर को रौशन करती उसकी खिलखिलाहटें... बस देखते ही बनती थीं... दीपावली का पावन पर्व बेटी की मुस्कुराहटों से पूरी तरह जगमगा उठा था... उन प्यारी खुशियों के कुछ मोती आज यहाँ पिरो कर लायी हूँ....

मम्मा के साथ बेटी ने पूरे घर में कैंडिल जलाई  
और फिर रोशनी से जगमगाते घरों को देख खिल उठी 
       
लेकिन ये क्या...! फुलझरी हाथ में आते ही चौंक पड़ी 
गोद से नीचे उतर डरते-डरते फुलझरी और चरखी को पास से देखा 

मम्मा ने प्यार से फुलझरी पकड़ना सिखाया 

 धीरे-धीरे बेटी का डर गायब होने लगा 

और अब उसे मज़ा आने लगा 

फिर तो बेटी ने पापा को भी फुलझरी हाथ में लेकर दिखाई
और इस तरह देखते ही देखते रुनझुन पूरी तरह से दिवाली की मस्ती में शामिल हो गयी अनार, फुलझरी, चरखी, पटाखे... बेटी ने बिना डरे सबका आनंद लिया... क्योंकि आपको तो पता है न! रुनझुन बिलकुल भी नहीं डरती... बेटी की इन मासूम खिलखिलाहटों और चमकती आँखों ने दीपावली के पावन पर्व में सचमुच ही चार चाँद लगा दिए....  

Thursday, July 28, 2011

साईं बाबा के दरबार में...


अक्टूबर 2002 ....  रुनझुन मामा-मामी से मिलने उनके पास भोपाल  पहुँची... वहाँ से वो शिरडी भी गई... साईं बाबा के दरबार में, उनका आशीर्वाद लेने... उन दिनों वहाँ साईं बाबा की पुण्यतिथि का उत्सव चल रहा था... रुनझुन भी उसमें शामिल होने के लिए सुबह-सुबह मम्मी-पापा, मामा-मामी और अमित भैया के साथ मंदिर पहुँची... उसे वहाँ बहुत ही अच्छा लगा... तो आइये कुछ लम्हे हम आपके साथ भी बाँटते हैं......
मामी के साथ रुनझुन
नींद से भरी आँखे...
                    
 (सुबह मंदिर जाने के लिए जल्दी उठना पड़ा न)
लेकिन जैसे ही अमित भैया ने गोद में लिया... मूड फ्रेश !

मामा-मामी, मम्मी, अमित भैया के साथ बेटी चली मंदिर  

अरे हाँ! साथ में पापा भी तो थे..
पहुँच गयी मंदिर के अन्दर !
बाबा का दर्शन किया, उनका आशीर्वाद लिया 
और फिर ये कारवां चला -"शनि शिन्ग्नापुर" 
जय शनि देव! 
वहाँ भी दर्शन-पूजन करने के बाद बेटी चल पड़ी सबके साथ रेलवे स्टेशन की ओर... वापस भोपाल जाने के लिए.....

Tuesday, July 26, 2011

कुछ नन्ही मासूम बातें...



रुनझुन और नानी एक-दूसरे को बहुत याद कर रहे थे... और रुनझुन को उनसे मिलने जाना था... इसलिए एकबार फिर रुनझुन की छुकछुक गाड़ी तैयार हो गयी... इस बार सफ़र में प्रतिमा मौसी भी साथ थी... और इसबार ट्रेन में रुनझुन की मस्ती का अंदाज़ भी अलग ही था...
 सफ़र के लिए बिलकुल तैयार !
येsssss... आ गई ट्रेन के अन्दर !
अपर बर्थ पर मस्ती शुरू...
तेजी से भागते दृश्यों पे टकटकी...
और अब, नानी के पास पहुँच कर रुनझुन की ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था...  रुनझुन को नानी का छोटा सा गार्डेन बहुत पसंद आया और सबसे पहले उसने वहाँ के सारे पौधों से दोस्ती कर ली...
देखा दोस्ती का फायदा! दोस्त की एक उँगली.. यानि पत्ती ने कैसे सहारा दिया..
भई, ये जगह तो बेटी को भा गयी !
फिर तो वहाँ घुस कर भी देखना ही था 
अरे! ये देखो!...पार भी निकल गई!!! 
और फिर कुछ मस्ती बूआ नानी के साथ भी हुई...
ना-ना!.. डरने की बात नहीं है... ये तो बहादुर बच्ची है! 
ये हैं नानी और बूआ नानी 
                   
बेटी कहाँ है... खोजो तो ज़रा!
एक नज़र इधर भी.....
याहूssss! पानी में मस्ती!!! 
लो भई, हो गया गंगे-गंगे!
देखो-देखो! कोमल मौसी चलना सीख रही है!...ही-ही-ही... 
और अब बेटी चली घूमने...
....मम्मी, नानी और कोमल मौसी के साथ...
जा पहुँची विश्वनाथ मंदिर (B.H.U.) के अन्दर 
वहाँ पर नंदी से भी मुलाकात हुई!!! 
              

Friday, July 22, 2011

वॉकर मतलब ईज़ी चेयर...

पल-पल बढ़ती नन्ही सी रुनझुन हर अगले पल कुछ नया, कुछ अनोखा करती रहती... उसकी बाल-सुलभ मासूम शरारतें अपने भोलेपन से हमारी सारी थकान, सारी परेशानियों को पल में दूर कर देतीं... उसके छोटे से पायल की मीठी रुनझुन पूरे घर में गूँजती रहती... उसकी नन्ही किलकारियों से हमारा घर-आँगन भर उठता... देखते ही देखते बेटी ने नन्हे-नन्हे कदमों से चलने की कोशिश भी शुरू कर दी... हमने उसकी मदद करने की सोची और वॉकर लेकर आये... लेकिन ये क्या...?.... वॉकर  को तो बेटी ने ईज़ी चेयर बना लिया... वॉकर का उपयोग बेटी कुछ यूँ करती....
वॉकर में आराम से बैठती...
उसमें लगे खिलौनों से थोड़ी देर खेलती... 

और बस! जब मन भर जाता तो बाहर निकालने की ज़िद चालू...वॉकर में बैठकर वॉक करना उसे बिलकुल पसंद नहीं था... और इस तरह वॉकर बेचारा तो ईज़ी चेयर बन गया... और बेटी स्वतन्त्र... बिना किसी बंधन के पूरे घर में डोलती-फिरती... जहाँ सहारा मिलता वहाँ पकड़-पकड़ कर, खड़े होकर चलती और जहाँ नहीं मिलता वहाँ पेट के बल सरक जाती... ऐसे ही गिरते-पड़ते क्या-क्या कारस्तानियाँ दिन भर घर में होती रहती उसकी एक बानगी आइये आपको भी दिखाते हैं....   
पहले तो मम्मी के साथ पूजा  
और फिर पापा के साथ मस्ती 
ये है बेटी की फेवरेट जगह 
क्योंकि यहाँ से नीला आसमान, चिड़िया, फूल और पत्ते सब दिखते हैं   
 टेबल ऊंचा है? कोई बात नहीं बेटी के पास तरकीब है न !
मम्मी की चुन्नी का बेहतर इस्तेमाल...स्पेशल पगड़ी 
बाप रे! इत्ता बड़ा गुब्बारा!...इसे तो हाथ-पैर, मुँह सबसे पकड़ना पड़ रहा है!!!  

Sunday, July 17, 2011

नटखट गुड़िया...

 नन्ही सी रुनझुन पहले तो लेटे-लेटे ही तरह-तरह की भाव-भंगिमाएँ बनाकर, अपनी अनोखी अदाओं से हमें मोहती रहती थी... कभी खुली हुई आँखों की काली पुतलियाँ कहीं ऊपर गायब कर लेती और कभी नीचे... हम डर जाते... और तभी वो खिलखिलाकर हँस पड़ती... पता नहीं वो ऐसा कैसे कर लेती थी... 
तीन महीने में उसने पहली बार खुद से करवट बदली... फिर धीरे-धीरे पेट के बल पूरा पलटना, फिर बैठना.... 
और अब पेट के बल सरकना भी शुरू कर दिया था... सरकने की अदा भी रुनझुन की बिलकुल निराली थी... पेट के बल होकर पहले एक के ऊपर एक हथेली रखकर दोनों हथेलियों को जोड़ती और फिर कुहनियों से पीछे को धक्का मारते हुए आगे सरक जाती...

ऐसा लगता मानो किसी बंकर में घुसने की प्रैक्टिस कर रही हो... और आँखें इतनी तेज़ कि सरसों से भी छोटी कोई काली चीज़ अगर फ़र्श पर पड़ी हो तो वहाँ निगाह थम जाती और उसे अपनी नन्ही सी उँगली और अँगूठे के बीच पकड़ ऊsss...ऊsss...ऊsss... की आवाज़ के साथ बड़े ही खतरनाक इरादे से देखती... हम ज़रा सा चूके नहीं कि वो चीज़ मुँह के अन्दर...

हम्म्म... कुछ तो मिल गया मुझे !!!
इसलिए हमें भी बिटिया के साथ अपनी ड्यूटी पर हमेशा मुस्तैद और चौकन्ना रहना पड़ता... धीरे-धीरे बेटी को खड़ा होना भी आ गया...

ये देखिये क्या बैलेंस है!!!
और फिर सहारा लेकर, पकड़-पकड़ कर चलना भी सीख लिया...


अरे संभलकर कहीं गिर न पड़ना!
बस अब क्या था... पूरे घर में बेटी का एकछत्र राज्य... ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ बेटी न पहुँच सके.... और वो कैसी-कैसी करामातें करती रहती थी ये अब आप खुद ही देख लीजिये, बेटी के ही अंदाज़ में....

ये हैं मेरे खिलौने!... देखिये कित्तेsss प्यारे-प्यारे हैं!!!

तो सबसे पहले तो इन्हें गिरा दूँ...नहीं-नहीं मेरा मतलब है इनसे खेल लूँ..




आप मुझे गन्दा बच्चा मत समझिएगा... मैं फिर सब उठा के रख भी दूँगी... मैं अच्छी और समझदार बच्ची हूँ न.... और चलिए अब मम्मी का ड्रेसिंग टेबल चेक करना है... 





अरे वाह! इसमें तो मैं दिख रही हूँ... ये मेरी नाक और ये मुँह! ही-ही-ही... मज़ा आ गया...

आइये!... अब आपको कुछ और दिखाती हूँ...

ओह हाँ ये!.... बेड का शेल्फ!!.... 

इसे खोल कर देखती हूँ पता नहीं मम्मा इसमें क्या रखती है?... पर चाभी कौन सी लगेगी....? 

अरे वाह! खुल गया सिमसिम!! लेकिन इसमें है क्या ?...अन्दर घुस कर देखूँ तो ज़रा...

अरे! ये गोल-गोल क्या है!!! 

कोई बात नहीं कुछ देर इससे ही खेल लेती हूँ..

अब बस! इसे रख दूँ और कहीं और चलूँ...

हाँ! ये रही वाशिंग मशीन!!!
मम्मी रोज़ मेरे कपड़े इसके अन्दर डाल देती है... पर ये तो बहुत ऊंचा है... मैं इसके अन्दर झाँक भी नहीं सकती!!!

अच्छा छोड़ो इसे... चलो सीढ़ियों की तरफ चलें....

 ऊँsss.... यहाँ तो मम्मी ने ताला लगा दिया... अब...? 

अरे वाह! कित्ताsss बड़ा आम !!! 

ये मुझे बहुत पसंद है...मम्मी तो काट के चम्मच से खिलायेगी... लेकिन मुझे चूस के खाना है... श्श्श... आप मम्मी से मत कहियेगा... मैं खुद ही खा लेती हूँ...

बूsss हूsss हू sss...

मम्मा ने मुझे जेल में... मेरा मतलब है कमरे में बंद कर दिया मैं बहुत शरारत कर रही थी न... और...और... वो... मैंने आम भी बिना धुले खाना शुरू कर दिया था न... इसलिए मम्मा गुस्सा हो गई... 

 कोई बात नहीं.... मम्मा को मनाना तो मेरे बाएँ हाथ का काम है...

ये देखिये मैं मच्छरदानी में फँस गई और मम्मी को हँसी आ गई... 
बस! गुस्सा छू.....है न कमाल!....

अच्छा अब बाय-बाय... गुड नाइट... फिर मिलूँगी.... 


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